राजस्थान की लोक संस्कृति

राजस्थान की लोक नाट्य कलाएं

यह मनोरंजन के लिए जनसाधारण के लोगो के द्वारा अभिनय किये जाते हैं। लोक नाट्य की परम्परा बड़ी प्राचीन है जिसको हम स्वांग, लीला और ख्याल के रुप में प्रचलित पाते हैं। लोक – नाट्य भरतपुर और जयपुर दोनों में बड़े लोकप्रिय हैं। रामायण और कृष्ण लीलाओं पर आधारित कथाओं के साथ लोक जीवन को इस तरह प्रदर्शित किया जाता है कि राम व सीता अथवा कृष्ण और राधा एक साधारण व्यक्ति के रुप में आते हैं और उनकी पोशाकें भी लोक लोक परिपाटी के अनुकूल होती है। इन प्रदर्शनों में धर्म, नैतिकता, मनोरंजन और व्यावहारिकता को इस तरह संयोजा जाता है कि लोक जीवन का सच्चा स्वरुप प्रकट हो जाता है। आज इन लीलाओं का मंचन कमतर हो चला है, इन लीलाओं के प्रति पात्र और दर्शक उदासीन हैं, फिर भी दशहरे के अवसर पर यत्र – तत्र इनका आयोजन होता रहता है। भरतपुर, अलवर, करौली आदि भागों में रासलीला का प्रचलन अद्यावधि भी देखा जाता है। इन खेलों की भाषा स्थानीय रहती है और कई स्थलों को संवाद अथवा गीतों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। बीच – बीच में हास्य -संवाद मनोरंजक होते हैं। प्रमुख लोक नाट्य कलाएँ निम्न हैं:-

– ख्याल:-

इसका शाब्दिक अर्थ हैं खेल-तमाषा।
इसका प्रारम्भ अठारहवी शताब्दी से माना जाता हैं। राजस्थान मंे लोकनाट्य की सबसे लोकप्रिय विद्या ख्याल हैं। ख्याल सम्पूर्ण राजस्थान में अपनी क्षेत्रीय रंगत के लिए बड़े लोकप्रिय है। इनमें अनेक वीरों की कहानियाँ इस तरह समाविष्ट हैं कि वे वीर रस प्रधान होते हुए भी अन्य रसों को व्यक्त करने में पीछे नहीं रहते। जब इन ख्यालों को व्यावसायिक होने का अवसर मिला तो विषय एवं रंगत की विशेषता ने इन्हें राजस्थान से बाहर भी लोकप्रिय बना दिया। ये ख्याल कभी कभी धार्मिक कथानकों को गायन, वादन और संवाद से सम्मलित कर इनकी उपयोगिता को बढ़ा देते हैं। धर्म और वीर रस प्रधान ख्यालों में अखरुपता तो दिखाई नहीं देती , परन्तु ध्येय की दृष्टि से अपने – अपने क्षेत्र में उनमें विविधता आ जाती है। फिर भी इनकी लोकप्रियता बनी रहती है। इन ख्यालों को क्षेत्रीय भाषाओं और स्थानीय परिवेश में रखे जाने से यह नहीं समझना चाहिए कि इनकी सांस्कृतिक इकाई में कोई व्यवधान है। वे ख्याल परम्परा के अंग हैं। अमर सिंह रो ख्याल , रुठी रानी रो ख्याल , पद्मिनी रो ख्याल , पार्वती रो ख्याल , आदि भिन्न भिन्न रंगत प्रस्तुत करने पर भी सांस्कृतिक आधार में समान है। कुछ प्रमुख ख्याल निम्न हैं:-

चिड़ावा ख्याल:-

  • यह शेखावाटी क्षेत्र का प्रसिद्ध हैं। इसके प्रवर्तक नानूरामजी थे।

हेला ख्याल:-

  • यह दौसा, लालसोट व सवांईमाधोपुर का प्रसिद्ध हैं।

अलीबख्शी ख्याल:- यह अलवर का प्रसिद्ध हैं।

तुर्राकंलगी ख्याल:-

  • मेवाड़ का प्रसिद्ध हैं। (तुर्रा:- षिव, कलंगी:- पार्वती)

कुचायनी ख्याल:-
इसके प्रवर्तक लच्छीरामजी थे। यह शेखावटी का प्रसिद्ध हैं।

– रम्मत:-

  • बीकानेर की प्रसिद्ध हैं।
  • होली व सावण में खेली जाती हैं।
  • रम्मत खेलने वालों को खेलार कहते हैं।
  • ‘‘स्वतन्त्र बावनी की रम्मत’’ प्रसिद्ध हैं।
  • रम्मत खेलते समय नगाड़े व ढ़ोलक बजते हैं।
  • ख्याल सम्पूर्ण राजस्थान में अपनी क्षेत्रीय रंगत के लिए बड़े लोकप्रिय है। इनमें अनेक वीरों की कहानियाँ इस तरह समाविष्ट हैं कि वे वीर रस प्रधान होते हुए भी अन्य रसों को व्यक्त करने में पीछे नहीं रहते। जब इन ख्यालों को व्यावसायिक होने का अवसर मिला तो विषय एवं रंगत की विशेषता ने इन्हें राजस्थान से बाहर भी लोकप्रिय बना दिया। ये ख्याल कभी कभी धार्मिक कथानकों को गायन, वादन और संवाद से सम्मलित कर इनकी उपयोगिता को बढ़ा देते हैं। धर्म और वीर रस प्रधान ख्यालों में अखरुपता तो दिखाई नहीं देती , परन्तु ध्येय की दृष्टि से अपने – अपने क्षेत्र में उनमें विविधता आ जाती है। फिर भी इनकी लोकप्रियता बनी रहती है। इन ख्यालों को क्षेत्रीय भाषाओं और स्थानीय परिवेश में रखे जाने से यह नहीं समझना चाहिए कि इनकी सांस्कृतिक इकाई में कोई व्यवधान है। वे ख्याल परम्परा के अंग हैं। अमर सिंह रो ख्याल , रुठी रानी रो ख्याल , पद्मिनी रो ख्याल , पार्वती रो ख्याल , आदि भिन्न भिन्न रंगत प्रस्तुत करने पर भी सांस्कृतिक आधार में समान है।

-तमाषा:-

  • यह जयपुर का प्रसिद्ध हैं।
  • महाराजा प्रतापसिंह के समय इसका प्रारम्भ जयपुर से हुआ था।
  • तमाषा खुले मंच पर होता है।
  • पंडित बंषीधर भट्ट ने तमाषे को नई ऊँचाईयां प्रदान की।

-स्वांग:-

  • यह होली के अवसर पर खेले जाते हैं।
  • इसका प्रारम्भ 13 वी 14 वीं शताब्दी मंे हुआ था।
  • स्वांग रचने वाले कों स्वांगिया या बहरूपिया कहते हैं।

-गवरी:-

  • भीलों का लोकनृत्य हैं जो नाटिका के रूप में मंचित किया जाता हैं।
  • गवरी को मरू नाट्य के नाम से भी जाना जाता हैं।
  • यह बांसवाड़ा, डुंगरपुर व उदयपुर का प्रसिद्ध हैं।
  • यह 40 दिनों तक चलने वाला एकमात्र नाट्य हैं।
  • इसमें षिव व भष्मासुर की कथा सुनाई जाती हैं।
  • षिव को पुरिया कहा जाता हैं।
  • वादन, संवाद, प्रस्तुतिकरण और लोक संस्कृति के प्रतीकों में मेवाड़ की ‘ गवरी ‘ निराली है। इसमें कई तरह नृत्य नाटिकायें होती हैं। गवरी का उद्भव शिव भस्मासुर की कथा से तथा किंवदन्तियों पर आधारित है। नृत्य नाटिकायें पौराणिक कथाओं, लोक कथाओं और लोकगाथाओं और लोकजीवन की विभिन्न झाँकियाँ पर आधारित होती है। शिव भस्मासुर कथा अनुसार भस्मासुर ने अपनी तपस्या से शिवजी को प्रसन्न करने की शक्ति प्राप्त कर ली थी। उसने पार्वती को पाने के लिए शिव पर ही उसका प्रयोग करना चाहा। अन्त में विष्णु भगवान ने अपनी लीला से शिव को बचाया और भस्मासुर का हाथ उसी के सिर पर रखवा कर उसका अन्त किया। इसी संदर्भ में शिवजी ने भीलों को साथ नृत्य किया जो आगे चलकर गवरी के रुप में प्रचलित हुए। गवरी का आयोजन रक्षा बन्धन के दूसरे दिन से शुरु होता है। खेड़ा देवी से भोपा भादवा कृष्णा एकम् को आज्ञा लेता है। इसके बाद पात्रों के कपड़े बनते हैं। पात्र मंदिरों में “धोक”देते हैं और नव – लाख देवी – देवता, चौसठ योगिनी और बावन भैंरु को स्मरण करते हैं। दो चार गाँवों के समझौते के बाद गवरी आरम्भ होती है जिसके पात्र व्रत और संयम रख कर इसको स्थान – स्थान पर जाकर खेलते हैं। गवरी का मुख्य पात्र बुढिया भस्मासुर का जप होता है और अन्य मुख्य पात्र”राया”होती है जो स्री वेष में पार्वती और विष्णु की प्रतीक होती है। भामट्या नाम का पात्र लोकभाषा में कविता बोलता है और खट्कइया उसको दोहरातें हैं और बीच – बीच में जोकर का काम करता है। बुढिया भी खट्कइये के समय – समय पर संवाद में पूरक बनता है। शेष सभी पात्र ‘ खेला ‘ कहलाते हैं। गवरी में मुख्य पात्र होते हैं। पात्रों के खेलों में गणपति, भूमरिया, भेवावड़, मीणा, कान – गूजरी, जोगी, लाखा बण्जारा नटड़ी तथा माता और शेर के खेल होते हैं। कान्ह – गूजरी के खेल में मजीरा और चीमरे बजते हैं और अन्य खेलों में मादल और थाली बजाते हैं। खेल के पात्रों में जादू, टोना, और तान्त्रिक प्रयोग किए जाते हैं, जिन्हें ‘ झाड़ा फूँका ‘ के माध्यम से ठीक किया जाता है। गवरी सवा महीने तक खेली जाती है। इस अवधि में राई , बुढिया और भोपा नंगे पाँव रहते हैं, जमीन पर सोते हैं और स्नान नहीं करते। कुछ क्षेत्रों में राई, बुढिया दूध पीकर ही रहते हैं; शराब माँस और हरी सब्जी का इस अरसे में निषेध रहता है। गवरी का व्यय, प्रमुख गाँव जहाँ से गवरी आरम्भ होती है, वहन करता है और जिन गाँवों में गवरी खेली जाती है, खाने – पीने का व्यय उसी गाँव केलोग करते हैं। आदिवासियों की गवरी गाँव के चौराहे से प्रारम्भ होती है और शकुन को लेकर दिशा निश्चित कर आगे गाँवों के लिए प्रस्थान करती है। गवरी समाप्ति पर दो दिन पहले ज्वार बोये जाते हैं और एक दिन पहले कुम्हार के यहाँ से मिट्टीका हाथी लाया जाता है। हाथी के आने के बाद भोपे का भाव बन्द हो जाता है। मय, जावरा हाथी के गवरी विसर्जन प्रक्रिया होती है जिसे किसी जलाशय में विसर्जित करते हैं। कहीं कहीं गाँव के बाहर गाड़ दिया जाता है। गवरी समाप्ति के छठे दिन नवरात्रि का आरम्भ हो जाता है। यह पर्व आदिवासी जाति पर पौराणिक तथा सामाजिक प्रभाव की अभिव्यक्ति है। इसकी लोकप्रियता सभी जातियों के लोगों की इसमें रुचि लेने से सुस्पष्ट है। उनके खेल, कथानक, वीर गाथाओं से जुड़ी हुई यह नृत्य नाटिका गवरी के आरम्भ और समाप्ति में पूर्ण रुप से स्वीकर की जाती है। ध्वाजारोहण और ध्वज का आद्योपान्त रखना दैविक शक्ति की मान्यता पर बल देना है। यह ध्वज एक प्रकार से अनुयायियों, दर्शकों और पात्रों के बीच दैवी शक्ति की प्रधानता स्वीकार करने के माध्यम का काम करता है। भोपे, पात्र और दर्शक सभी खेल के हर क्षण देवी की प्रत्यक्षता अनुभव करते हैं। युद्ध विजय और पराजयों तथा नृत्यों के प्रसंग देवी के आशीर्वाद से आरम्भ और समाप्त होते हैं। ऐसे लगता है कि गवरी द्वारा सम्पूर्ण वातावरण आस्था से ओत – प्रोत हो जाता है। इसके द्वारा नाटकीय अभिव्यक्तियाँ एक ऐसी सामाजिक स्वतन्त्रता की प्रतीक बन जाती है कि उनमें जात – पात, रंग, वर्ण भेद का कोई स्थान नहीं रहता। देव देवताओं की आराधना के प्रसंगों में गवरी के पात्र पूर्ण स्वतन्त्रता से कई र – रिवाजों तथा गाँवों के अधिकारियों की आलोचना एवं समर्थन करते हैं जिससे दर्शकों में एक सामाजिक चेतना अनायास प्रवेश कर जाती है और स्वतन्त्र जीवन का सूत्र बन जाती है।

-नौटंकी:-

  • राजस्थान के पूर्वी भाग भरतपुर, धौलपुर, अलवर, करौली की प्रसिद्ध हैं।
  • इसमें नौ प्रकार के वाद्य यंत्र बजते हैं।
  • ढ़ोलक व सारंगी प्रमुख होते हैं।
  • मुख्य विषय:- – राजा हरिषचन्द्र की कथा
  • नल दम्पती की कहानी
  • लैला-मंजनू की कहानी

-भवाई:-

  • इस लोक नृत्य को लोक नाटक के रूप में खेला जाता हैं।
  • इसके जन्मदाता वाघजी थे।

-चारबैत शैली:-

  • टोंक का प्रसिद्ध हैं। मुख्य वाद्य यन्त्र ढ़फ होता हैं।

-रसिया दंगल:- 

  • भरतपुर (ड़ीग) का प्रसिद्ध हैं।

राजस्थान के लोकवाद्य यन्त्र

वाद्ययन्त्र मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं:-

तत् वाद्य यन्त्र:-

  • इसमें तार लगे होते हैं।
  • तार का प्रकार व उनकी संख्या अलग-अलग वाद्य यन्त्रों अलग-अलग होती हैं।
  • राजस्थान में लोक संगीत किसी न किसी लोकवाद्य से जुड़ा हुआ है। पाबुजी की कथा के साथ रावण हत्या या गूजरी, बगड़ाव के साथ गला लगे, अर्जुननंग (बाँसवाड़ा, डूँगरपुर) के साथ केन्द्र और अनेक बड़ी गेय कथाओं के साथ तंदूरा व मजीरा जुड़ा हुआ है। यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि अनेक अवदानात्मक नायकों के साथ वाद्य विशिष्ट रुप से प्रयुक्त हो रहे हैं। इसी प्रकार देवीयों के साथ भी वाद्य हैं। कैलादेवी के मेले में नगाड़ें, तासे और तीनतारा है जो सारंगी की तरह बजाया जाता है। उसके तीन मुख्य तार घोड़ों की पूँछ के बाल के गुँथाव से लगाए जाते हैं। जोगिया सारंगी का प्रसार पूरे अलवर, भरतपुर जिले में हैं –साथ ही झूँनझूँनू, सीकर से लेकर नागौर तक का मुख्य लोक वाद्य है। जोगियों के साथ साथ कोली, माली व गू भी एक प्रकार का पूंगी वाद्य बजाते हैं। इस क्षेत्र में इसे पूंगी कहा जाता है। सामान्यत: पूंगी नामक वाद्य का नाम सपेरों से जुड़ा हुआ है। नलीवाले तूँबे से यह वाद्य बनता है। किन्तु इस क्षेत्र में पूंगी का अर्थ मशक व बंग पाइप है। यह बकरी की खाल से बनी एक बड़ी मशक है जिसमें एक ओर वाल्व लगे हुए मुख से फूँक भरी जाती है जिससे रीड लगी हुई दो बाँसुरियों से संगीत – ध्वनी निकलती है। सांगीतिक रुप में पूँग का प्रयोग सीमित है। इसमें केवल पाँच छेद होते हैं जो पूरे सप्तक का काम नहीं करते। इस प्रकार के पाँच छेद वाले वाद्य लक्ष्मणगढ़ के मीणा क्षेत्र से लगे आदिवासी जन – समुदाय में प्रचलित है जो खेराड़ और मेवाड़ तक चले जाते हैं। भीलवाड़ा के निकट भी भीलों द्वारा देशी मशक बनाई व बजाई जाती है। लक्ष्मणगढ़ एवं उसके आसपास के क्षेत्र में मेव व मीणों की बड़ी बस्तियाँ हैं। इन मेवों में मिरासी है जो गायक हैं, ये चिकारा, जोगिया, सारंगी, शास्रीय सारंगी जैसे यन्त्र वाद्यों को बजाते हैं। भपंग एक प्रकार का लय वाद्य है तो तूँबे पर चमड़ा मढ़ कर एक तार के तनाव से बजता है। मिरासियों में भपंगवादन अदभुत् जटिल लयों को अनुबंधित कर सकता है। भीलों में ढूचकों एवं भपूंग वाद्य प्रचलित है। ढोल, शहनाई, ढोलक, पूँगियों आदि का प्रयोग विवाह, त्यौहार आदि रीजि – रिवाजों और उत्सवों में किया जाता है।

इकतारा:-

  • इसमें एक तारा होता हैं, इकतारा मुख्यतः नाथ सम्प्रदाय, कालबेलिया, साधुसंन्यासी के द्वारा बजायाजाता हैं।

जंतर:-

  • वीणा की आकृति का बना होता हैं।
  • लेकिन इसमें दो तुम्बे होते हैं।
  • देवनारायणजी की फड़ बांचते समय गुर्जर जाति के भोपे जन्तर बजाते हैं।

रावणहत्था:-

  • रावणहत्था नारियल की कटोरी पर बकरे का चमड़ा लगाकर बजाया जाता हैं।
  • इसमें नौतार होते हैं।
  • यह मुख्यतः पाबूजी की फड़ बांचते समय बजता हैं।

भंपग:-

  • यह वाद्ययन्त्र राजस्थान के पूर्वी क्षेत्र मंे बजाया जाता है।
  • जहुर खां मेवाजी भंपग के प्रमख कलाकार हैं।

कामायचा:-

  • यह सारंगी के समान वाद्य यन्त्र होते हैं।
  • जिसमें 27 तार लगे होते हैं।
  • राजस्थान के पष्चिमी भाग जैसलमेर, बाड़मेर में मांगलिया जाति के लोगो द्वारा बाजाया जाता है।

रबाज:-

  • सारंगी के समान वाद्य यन्त्र होता हैं।
  • इसमें 12 तार होते हैं, मेवाड़ के राव भाटी जाति के लोगों द्वारा बजाया जाता हैं।
  • रम्मत खेलते समय भी रबाज बजाया जाता है।

 

राजस्थानी लोकगीत :

राजस्थानी लोकगीत संगीत के क्षेत्र में अनमोल हैं। इनको किसी ने न लिखा है और न ही इनके रचयिता का पता है। ये मौखिक परम्परा और अनुश्रूती पर आधारित रहे हैं। मानस पटल की उपज लोने के नाते इनमें सांस्कृतिक और कलात्मक प्रवृत्तियाँ प्रविष्ट हो जाती हैं। इनमें मानव समाज की विशिद्ध मनोवृत्तियाँ और भावनाएँ समयोचित प्रसंगों पर हर्ष – विषाद, प्रेम ईर्ष्या, उल्लास – भक्ति आदि प्रकट होती हैं। मौखिक होने से एकल और बहुधा सामुहिक रुप से इन्हें गाया जाता है। इनके द्वारा बुद्धि, सौन्दर्य, सुख, भक्ति तथा आनन्द का अनुभव होता है। विवाह, जन्म या अन्य त्यौहारों पर पति – पत्नि, ननद – भौजाई, सती, मातृ – भक्ति, शौर्य, रीति – रिवाज, शक्ति, आराधना, ज्ञान, दर्शन, नीति आदि विषयों को प्राचीन और वर्तमानकालीन आदर्शों और मानव धर्म के सिद्धान्तों के रुप में इनमें अभिव्यक्ति होती हैं। गीतों में उपदेश और त्याग का इतना वर्णन रहता है कि गाने वाले और सुनने वाले में एक नई प्रेरणा का भाव भर जाता है। विवाह और पुत्र जन्म के गीतों में उल्लास है तो पुत्री की विदाई में लौकिक दुख का प्राबल्य है। इसी तरह रात्रि – जागरण के गीतों में भक्ति रस समाया मिलता है। तीज के त्यौहार के गीतों में प्राकृतिक छटा और पति – पत्नि संयोग या वियोग तथा सहेलियों के सहवास के भावों का अच्छा संयोग दिखाई देता है। जन – जीवन में व्याप्त हर्ष, कामनाओं और अभिलाषाओं का यदि अविरल स्रोत प्राप्त करना है तो वह लोकगीतों में मिलेगा। लोकगीतों का माध्यम जितनी स्रियाँ हैं उतने पुरुष नहीं। जितना प्रेम, स्नेह, विषाद, पीड़न, और उल्लास का चित्रण महिलाएँ कर सकती हैं अन्य व्यक्ति नहीं कर सकते। उनके कण्ठ स्वर निकलते हैं व वास्तविकता के निकट में सहजता से पहुँचते हैं। गीत के बोल बालिका अवस्था में यौवन या प्रौढ़ अवस्था तक वेद वाक्य बन जाते हैं जिससे महिलाओं में एक अनमोल आस्था उत्पन्न होती है। वेदों की भाँति लोकगीत भी हमारी संस्कृति के अटूट भण्डार बन जाते हैं और समाज के भव्य भवन को स्थायित्व प्रदान करते हैं।

गणगौर के अवसर पर गाये जाने वाले अनेक गीतों में भक्ति और प्रेम टपकता है जो साहित्य की दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण है :

“खेलग दौ गिणगौर भमवर, म्हाँनै पूजण दौ गिणगौर
औ जी म्हारी सैल्याँ जौवे बार, भँवर म्हानै खैलण दौ गिणगौर”

इसी प्रकार यौवन की पिपासा के साधनों के जुटाने में स्री हृदय कितनी शान्ति का अनुभव करती है जो इस गीत में प्रकट है :

“चुग – टुग कलियाँ सेज बिछाई
पौढणरी रुत आसी”

मारुजी को सम्बोधित कर सौभाग्याकांक्षा का रुप भी इन पंक्तियों द्वारा पत्नी व्यक्त करती है :

“उदयपुर से तो सायबा पीलो मंगओजी
तो नानीसी बंधण बंधाओ गाढा मारुजी”

विवाह या बनौले के अवसर रक गाये जाने वाले गीतों में राजस्थान की गर्मी और सौन्दर्य का अच्छा वर्णन है :

“धूप तपे धरती तपे रे
गोरो गोरो मुखड़ों कुम्हलाय”

तीज सम्बन्धित गीतों में कितनी लालसा है :

“तीज सुण्याँ घर आव
मँझल आपरो नौकरी महाराज
जीत सुण्याँ घर आव”

होली सम्बन्धी गीत में कितना उल्लास भरा है :

“म्हाँरी घूमर छे नखराली ए माँ
घूमर रमवा म्हे जास्याँ “