राजस्थान का इतिहास

सारांश : राजस्थान का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है। ईसा पूर्व 3000 से 1000 के बीच यहाँ की संस्कृति सिंधु घाटी सभ्यता जैसी थी। 12वीं सदी तक राजस्थान के अधिकांश भाग पर गुर्जरों का राज्य रहा है। गुजरात तथा राजस्थान का अधिकांश भाग गुर्जरत्रा (गुर्जरों से रक्षित देश) के नाम से जाना जाता था। गुर्जर प्रतिहारो ने 300 सालों तक पूरे उत्तरी-भारत को अरब आक्रान्ताओ से बचाया था। बाद में जब राजपूतों ने इस राज्य के विविध भागों पर अपना आधिपत्य जमा लिया तो यह क्षेत्र ब्रिटिशकाल में राजपूताना (राजपूतों का स्थान) कहलाने लगा। 12वीं शताब्दी के बाद मेवाड़ पर गुहिलोतों ने राज्य किया। मेवाड़ के अलावा जो अन्य रियासतें ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमुख रहीं, वे हैं – भरतपुर, जयपुर, बूँदी, मारवाड़, कोटा, और अलवर। अन्य सभी रियासतें इन्हीं रियासतों से बनी। इन सभी रियासतों ने 1818 में अधीनस्थ गठबंधन की ब्रिटिश संधि स्वीकार कर ली जिसमें राजाओं के हितों की रक्षा की व्यवस्था थी, लेकिन इस संधि से आम जनता स्वाभाविक रूप से असंतुष्ट थी।
वर्ष 1857 के विद्रोह के बाद लोग ‘स्वतंत्रता आंदोलन’ में भाग लेने के लिए महात्मा गाँधी के नेतृत्व में एकजुट हुए। सन् 1935 में अंग्रेज़ी शासन वाले भारत में प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद राजस्थान में नागरिक स्वतंत्रता तथा राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन और तेज़ हो गया। 1948 में इन बिखरी हुई रियासतों को एक करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जो 1956 में राज्य में पुनर्गठन क़ानून लागू होने तक जारी रही। सबसे पहले 1948 में ‘मत्स्य संघ’ बना, जिसमें कुछ ही रियासतें शामिल हुईं। धीरे-धीरे बाकी रियासतें भी इसमें मिलती गईं। सन् 1949 तक बीकानेर, जयपुर, जोधपुर और जैसलमेर जैसी मुख्य रियासतें इसमें शामिल हो चुकी थीं और इसे ‘बृहत्तर राजस्थान संयुक्त राज्य’ का नाम दिया गया। सन् 1958 में अजमेर, आबू रोड तालुका और सुनेल टप्पा के भी शामिल हो जाने के बाद वर्तमान राजस्थान राज्य विधिवत अस्तित्व में आया। राजस्थान की समूची पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान पड़ता है, जबकि उत्तर में पंजाब, उत्तर पूर्व में हरियाणा, पूर्व में उत्तर प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में मध्य प्रदेश और दक्षिण-पश्चिम में गुजरात है।

 

राजस्थान के इतिहास जानने के स्त्रोत

राजस्थान के इतिहास जानने के स्त्रोत
1. षिलालेख  2. गुहालेख  3. प्रषस्तियां
4. भग्नावेष  5. सिक्के     6. पत्र
7. ताम्रपत्र    8. खनन से प्राप्त  9. पुरातात्विकसामग्री

प्रमुख षिलालेख

बरली का षिलालेख (चित्तौड़):-

  • यह प्रथम षिलालेख हैं, जो बाहनीलिपी में लिखा गया हैं।
  • इस षिलालेख में अजमेर और चित्तौड़ में जैन धर्म का प्रसार बताया गया हैं।

सांमौली का षिलालेख (उदयपुर):-

  • संस्कृत भाषा में लिखित इस षिलालेख से मेवाड़ के गुहिल वंष की जानकारी प्राप्त होती हैं।

घटियाला का षिलालेख (जोधपुर):-

  • यह षिलालेख जोधपुर में स्थित हैं। जो प्रतिहार शासक की तत्कालीन जानारी देते हैं।

चित्तौड़ का षिलालेखः-

  • यह चित्तौड़ के राजा भोज और उनके उत्तराधिकारियों की जानकारी देता हैं।

बिजौलिया षिलालेख (भीलवाड़ा):-

  • यह सांभर और अजमेर के चैहान वंष की जानकारी देता हैं।

चिरवा का षिलालेख (उदयपुर):-

  • यह बप्पारावल के समय मेवाड़ की धार्मिंक स्थिति का वर्णन करते हैं।

महत्वपूर्ण प्रषस्तियां

रणकपुर (पाली):-

  • यहां जैन चैमुख मंदिर हैं। यह जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • यहां 1444 खंभे हैं।
  • यह प्रषस्ति बप्पा रावल से लेकर महाराणा कुम्भा तक इतिहास बताती हैं।

किर्तिस्तम्भ प्रषस्ति (चित्तौड़):-

  • यह प्रषस्ति मेवाड़ के महाराणाओं की वंषावली बताती हैं।
  • साथ ही साथ 13 वीं शताब्दी में राजस्थान की धार्मिंक-सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति को भी बताती हैं।

राजप्रषस्ति (राजसमन्द):-

  • यहां से राजस्थान का सबसे बड़ा षिलालेख प्राप्त हुआ हैं।
  • यह षिलालेख राजसमंद झील के किनारे 25 काले पत्थरों की षिलाओं पर अंकित हैं।
  • यह संस्कृत भाषा में लिखा गया हैं।
  • इसे रणछोड़ भट्ट ने लिखा था।

जामा मस्जिद का लेख (भरतपुर):-

  • इस लेख से भरतपुर के शासक बलवंतसिंह की जानकारी मिलती हैं।

महत्वपूर्ण ताम्रपत्र

आहड़ताम्र पत्र:-

  • यह गुजरात के शासक भीमदेव द्वितीय से लेकर सोलंकी शासकों की जानकारी देता हैं।

खेरोदो ताम्रपत्र:-

  • यह ताम्रपत्र महाराणा कुंभा की गतिविधियों की जानकारी देता हैं।
महत्वपूर्ण सिक्कें
1. अष्वेषाही जैसलमेर 2. शाहआलमी मेवाड़ 3. गजशाही बीकानेर
4. तमचाषाही धौलपुर 5. सालिमषाही बांसवाड़ा 6. रामषाही बूंदी
7. विजयषाही जोधपुर 8. झाड़षाही जयपुर 9. रावशाही अलवर

कलदार सिक्कें:- ये सिक्कें ब्रिटिषकाल में अंग्रेजों के द्वारा चलाए गए।

महत्वपूर्ण पुरालेख

  • खरीता:- एक राजा को दूसरे राजा द्वारा भेजे गए पत्र।
  • परवाना (प्रवाहन):- शासक द्वारा अपने अधीनस्थ को भेजे जाने वाले पत्र।
  • फरमान (रूक्के/निषान):- यह पत्र शासक द्वारा शाहीवर्ग के लोगों व विदेषी शासकों को लिखे जातें थे।
  • बहियां:- राजा के दैनिक कार्यों के संचालन का बोध होता हैं।
  •  हकीकत री बही:- राजा की दैनिक दिनचर्या।
  •  हुकूमत री बही:- राजा के शासकीय आदेषों की नकल की जाती थी।
  •  खरीताबही:- राजा को प्राप्त होनेवाले महत्वपूर्ण पत्रों की नकल की जाती थी।
  •  कमठाना बही:- राजकीय महलों व भवनों के निर्माण पर होने वाले खर्च का
  • लेखा-जोखा रखा जाता था।
  •  ओहिया बही:- भ्रष्टाचाी कर्मचारियों की सूची।
  •  मुल्क:- राज्य की आर्थिंक स्थिती।
  •  जमाबंदी:- राजस्व सम्बन्धित जानकारी रखी जाती थी।

राजस्थान-जनपदकाल

राजस्थान के प्राचीन इतिहास को तीन भागों में बांटा जाता हैं। जिस समय भारत में सोलह जनपद थे, उस समय राजस्थान में तीन जनपदों का उदय हुआ:-

  • मत्स्य जनपद:- अलवर-जयपुर का क्षेत्र, इसकी राजधानी विराटनगर थी।
  • कुरू जनपद:- अलवर से लेकर दिल्ली तक का क्षेत्र आता था, इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी।
  • शूरसेन:- धौलपुर, भरतपुर, करौली का क्षेत्र। इसकी राजधानी मयुरा थी।

इस युग के प्रमाण बैराठ में अषोक के आब्रु षिलालेख प्राप्त होते हैं।

कुषाण:-

  • राजस्थान के पूर्वी भाग पर कुषाणों का अधिकार था। राजस्थान के पूर्वी भाग में कुषाणों का अधिकार था। सुदर्षन झील (भरतपुर) के अभिलेख से कुषाणों की पुष्टि होती हैं।

गुप्तकाल:-

  • समुन्द्रगुप्त ने राजस्थान के दक्षिण भाग में अधिकार किया था। गुप्तकालीन शासकों के सिक्के बयाना (भरतपुर) से मिलते हैं।

हुणयुग:-

  • हुणषासक तोरमाण ने राजस्थान पर आक्रमण किया और इसे अपने राज्य में मिला लिया।
  • मिहिरकुल तोरमाण के पुत्र थे, जिन्होने कोटा में (बाड़ोली) षिवमंदिर का निर्माण करवाया।
  • यह मंदिर पंचायतन शैली से बना हैं।

वर्धन युग:-

  • सातवी शताब्दी में प्रभाकर वर्धन ने गुर्जरों से राजस्थान को छीना लेकिन इसी शताब्दी में इसकी मृत्युहो गयी और गुर्जरों ने पुनः राजस्थान पर अधिकार कर लिया।